Tuesday, February 10, 2026

Story: सादगी ही सुकून 2

अध्याय 2: काका का राज

अगले दिन शाम को जैसे ही सूरज की लालिमा आसमान पर बिखरने लगी, आर्यन वापस उसी टपरी पर पहुँचा। लेकिन इस बार उसके कंधे पर वो भारी लैपटॉप बैग नहीं था जो उसकी रीढ़ को झुका देता था। वह खाली हाथ था और उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो महीनों बाद दिखाई दी थी।

काका ने दूर से ही उसे देख लिया और अपनी चिर-परिचित हंसी के साथ बोले, "अरे! आज तो मेरा 'डिजिटल बेटा' बिल्कुल हल्का होकर आया है! क्या बात है, आज दफ्तर घर भूल आए?"

आर्यन बेंच पर बैठते हुए चैन की सांस ली और बोला, "काका, आज सच में हाथ खाली हैं, पर मन भरा हुआ लग रहा है। कल आपकी बातों ने कुछ ऐसा असर किया कि मैंने रात भर फोन को 'डू नॉट डिस्टर्ब' पर रखा। यकीन मानिए, मुझे डर था कि दुनिया रुक जाएगी, पर सुबह उठा तो सब वैसा ही था। दुनिया नहीं रुकी काका, पर मेरी बरसों पुरानी खोई हुई नींद ज़रूर वापस आ गई।"

काका ने मुस्कुराते हुए इस बार दो कुल्हड़ चाय बनाई—एक आर्यन के लिए और एक खुद के लिए। यह पहली बार था जब काका अपनी कड़ाही छोड़कर आर्यन के साथ बेंच पर बैठे थे।

आर्यन ने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा, "काका, आप इतनी बड़ी-बड़ी बातें इतनी सादगी से कैसे कह लेते हैं?"
काका की आँखों में एक चमक सी आई, जैसे कोई पुराना पन्ना खुल रहा हो। उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, ये सादगी मैंने कमाई है। मैं हमेशा से यहाँ चाय नहीं बनाता था। बरसों पहले शहर के उसी सबसे बड़े ऑफिस में मैं 'मैनेजिंग डायरेक्टर' हुआ करता था जहाँ आज तुम जैसे हज़ारों बच्चे मशीन बने हुए हैं। मेरे पास सब कुछ था—पैसा, रुतबा, बड़ी गाड़ी... बस एक 'सुकून' नहीं था। एक दिन खुद से सवाल किया कि क्या मैं जीने के लिए कमा रहा हूँ या सिर्फ कमाने के लिए जी रहा हूँ? जवाब मिलते ही मैंने वो कांच की दीवारें छोड़ दीं और इस मिट्टी के कुल्हड़ को अपना लिया।"

आर्यन सन्न रह गया। जिसे वह एक साधारण चाय वाला समझ रहा था, वह दरअसल उस कॉर्पोरेट दलदल का सबसे बड़ा खिलाड़ी रह चुका था। काका की कहानी ने आर्यन के भीतर एक नई हिम्मत भर दी।

आर्यन ने कुल्हड़ को कसकर पकड़ते हुए कहा, "काका, अब मुझे मेरा रास्ता मिल गया है। मैं अब अपना काम उन्हीं पहाड़ों से करूँगा जहाँ सिग्नल भले ही कमजोर हों, पर सादगी मजबूत हो। मैं भागना बंद करूँगा और जीना शुरू करूँगा।"

काका ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोले, "जीत उसी की होती है बेटा, जो खुद को नहीं हारने देता।"

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