Thursday, February 12, 2026

Story: सादगी ही सुकून 4

अध्याय 4: अजनबी की एंट्री



जैसे ही आर्यन और इशानी की परछाइयां अंधेरे में ओझल हुईं, काका ने एक गहरी सांस ली और अपनी दुकान की बेंचों को साफ करने लगे। तभी सड़क के दूसरी तरफ से एक महंगी काली गाड़ी आकर रुकी।

उसमें से एक अधेड़ उम्र का आदमी उतरा, जिसने बहुत ही महंगा सूट पहना था। उसने टपरी के पास आकर चारों ओर देखा और काका के पास गया

"विवेक... तुम... तुम अभी भी यहीं हो?" उस आदमी ने पूछा। 

उसकी आवाज़ में हैरानी और एक पुरानी पहचान की झलक थी। काका विवेक मुस्कुराते हुए, चाय का एक और कुल्हड़ समीर की ओर बढ़ाते हुए बोले, "हाँ समीर, और इस बार पहले से ज़्यादा खुश हूँ। तुम बताओ, क्या हाल है तुम्हारे और तुम्हारी 'बड़ी' कंपनी के?"

समीर: (चाय का कुल्हड़ थामते हुए) "हाल तो ठीक है विवेक, पर सुकून नहीं है। कंपनी मुनाफ़ा तो बहुत कमा रही है, पर लोग... लोग बस मशीन बनते जा रहे हैं। भागते-भागते थक गए हैं।"

काका : (शांत भाव से) "बेटा, बड़ी कुर्सियों पर बैठने से कद बढ़ता है, सुकून नहीं। तुम वहाँ आऊंगा तो तुम्हारी फाइलों में खो जाऊंगा। तुम यहाँ आओ, यहाँ तुम खुद को पाओगे।"

समीर: (चाय की एक घूँट लेते हुए, चारों ओर देखता है) "शायद तुम सही कहते हो। मुझे भी लगने लगा है कि कहीं कुछ छूट रहा है। पर क्या? मेरे पास सब कुछ है।"

काका : "तुम्हारे पास सब कुछ है, समीर, पर वो नहीं है जो तुम्हारी 'बड़ी' कंपनी को चाहिए—इंसानियत। वो जो आर्यन और इशानी जैसी सादगी में है।"

समीर: (चौंककर) "आर्यन और इशानी? वो कौन हैं?"

काका : "वो दो युवा हैं जो कुछ दिन पहले तुम्हारी ही तरह भाग रहे थे। अब उन्होंने समझ लिया है कि असली सफलता क्या है।"

समीर: (सोचते हुए) "विवेक, क्या तुम ऐसे किसी को जानते हो जो काम को बोझ नहीं, बल्कि एक कला की तरह देखता हो? मुझे कुछ ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो मेरे कर्मचारियों को यह 'सुकून' सिखा सकें।"

काका : "मैं तुम्हें दो नाम दे सकता हूँ, जो इस शहर के शोर में भी अपनी सादगी नहीं भूले हैं - आर्यन और इशानी।"

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